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Dr. Udayanath Jha 'Ashok' (Naganand)

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Dr. Udayanath Jha 'Ashok' (Naganand)
Dr. Udayanath Jha 'Ashok' (Naganand)
Dr. Udayanath Jha 'Ashok' (Naganand)
Born 06 April 1959 (also listed as 19 February 1959 in the provided note)

✦ ★ डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ ★ ✦

साहित्यिक एवं छद्म नाम — ‘नागानन्द’

संस्कृतविद् • साहित्यकार • भाषाविद् • शोधकर्ता • बहुभाषी लेखक • शिक्षाविद् • अनुवादक • समीक्षक

संस्कृत, हिन्दी, मैथिली, ओड़िया और अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में सृजन करने वाले भारतीय विद्वान, जिनकी बौद्धिक यात्रा अध्यापन, शोध, साहित्य, संस्कृति और भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण को समर्पित रही है।


🌟 परिचय

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’, हिन्दी साहित्य में ‘नागानन्द’ नाम से भी परिचित, भारत के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वानों, बहुभाषी साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और ग्रन्थकारों में एक विशिष्ट नाम हैं।

व्याकरण, संस्कृत साहित्य, भाषाविज्ञान, हिन्दी, मैथिली, भारतीय दर्शन, वेद-वेदांग, तन्त्र, इतिहास और संस्कृति जैसे विविध क्षेत्रों में उनका दीर्घ अध्ययन तथा लेखन उनकी विद्वत्ता की व्यापकता को दर्शाता है।

लगभग पाँच दशकों में फैली उनकी शैक्षणिक एवं साहित्यिक यात्रा में अध्यापन, शोध, भाषायी अध्ययन, ग्रन्थ-लेखन, अनुवाद, टीका-लेखन और भारतीय बौद्धिक परम्पराओं के दस्तावेजीकरण का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

उनके नाम से मौलिक रचनाओं, अनुवादों और टीका-ग्रन्थों सहित लगभग 145 पुस्तकों के लेखन का उल्लेख मिलता है।

उनका व्यक्तित्व केवल एक विश्वविद्यालयी प्राध्यापक तक सीमित नहीं रहा; वे ऐसे विद्वान के रूप में स्थापित हुए जिन्होंने परम्परागत संस्कृत अध्ययन को आधुनिक शोध-दृष्टि और बहुभाषिक साहित्यिक चेतना के साथ जोड़ा।


🕉️ मिथिला की विद्वत् परम्परा में जन्म

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ का संबंध बिहार के मिथिलांचल की उस भूमि से है, जिसकी पहचान सदियों से संस्कृत, न्याय, दर्शन, व्याकरण, वेद-वेदांग और साहित्यिक विद्वत्ता के लिए रही है।

उनका पैतृक ग्राम बिट्ठो, पंचायत सरिसब-पाही, प्रखंड पण्डौल, जिला मधुबनी, बिहार है।

उनके जीवन पर मिथिला की विद्वत् परम्परा और पारिवारिक बौद्धिक वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ा।

उनका परिवार कई पीढ़ियों से संस्कृत, दर्शन, व्याकरण और साहित्य की साधना से जुड़ा रहा है। यही वातावरण आगे चलकर उनके व्यक्तित्व, अध्ययन और लेखन की आधारभूमि बना।


👑 एक असाधारण विद्वत् वंश-परम्परा

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ ऐसे परिवार से आते हैं जिसमें कई पीढ़ियों तक प्रसिद्ध विद्वान, दार्शनिक, वैयाकरण और ग्रन्थकार हुए।

उनके पितामह पण्डित कृष्णमाधव झा अपने समय के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वान, दार्शनिक और वैयाकरण थे। उन्हें ‘दार्शनिक सार्वभौम’, ‘सर्वतन्त्र स्वतंत्र’ और ‘महामहोपाध्याय’ जैसी प्रतिष्ठित विद्वत् उपाधियों से सम्मानित किए जाने का उल्लेख मिलता है।

उनके पिता डॉ. गंगानाथ झा, जिनका उपनाम ‘बुझनुक’ था, स्वयं साहित्य के विद्वान और लेखक थे।

उनके चाचा डॉ. किशोरनाथ झा भी संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान रहे और उन्हें राष्ट्रपति-सम्मान तथा विश्वभारती पुरस्कार प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।

परिवार की विद्वत् परम्परा में वैयाकरण केसरी पण्डित चन्द्रमाधव झा का नाम भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

उनकी चाची कामाख्या देवी समकालीन मैथिली लेखिकाओं में प्रतिष्ठित नाम थीं और उन्हें साहित्य अकादमी से मौलिक ग्रन्थ-लेखन से संबंधित सम्मान प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार डॉ. झा की शैक्षणिक यात्रा किसी आकस्मिक उपलब्धि का परिणाम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही भारतीय विद्वत्ता और ग्रन्थ-परम्परा की आधुनिक निरन्तरता के रूप में देखी जा सकती है।


🎓 बहुआयामी शिक्षा

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ की शैक्षणिक योग्यता उनकी बहुविषयी विद्वत्ता का प्रमाण प्रस्तुत करती है।

उन्होंने:

📜 व्याकरण में आचार्य

📚 साहित्य में आचार्य

🕉️ संस्कृत में M.A.

🔤 भाषाविज्ञान में M.A.

✍️ हिन्दी में साहित्यरत्न

🟠 गुजराती भाषा में डिप्लोमा

🟡 कन्नड़ भाषा में डिप्लोमा

📖 ओड़िया भाषा में ‘कोविद’

की शिक्षा प्राप्त की।

इसके अतिरिक्त उन्होंने दो अलग-अलग विषयों — साहित्य और संस्कृत — में दो विश्वविद्यालयों से Ph.D. की उपाधियाँ प्राप्त कीं तथा आगे चलकर D.Litt. की उच्च शैक्षणिक उपाधि भी अर्जित की।

इस व्यापक अध्ययन ने उन्हें केवल संस्कृत साहित्य का विशेषज्ञ नहीं बनाया, बल्कि भाषा, साहित्य और संस्कृति को तुलनात्मक एवं बहुभाषिक दृष्टि से देखने की क्षमता भी प्रदान की।


🌐 असाधारण बहुभाषिक प्रतिभा

डॉ. झा की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में उनकी बहुभाषिक साहित्यिक क्षमता है।

उनके लेखन और अध्ययन का विस्तार मुख्य रूप से:

संस्कृत • हिन्दी • मैथिली • ओड़िया • अंग्रेजी • गुजराती • कन्नड़

सहित अनेक भाषाओं तक रहा है।

अलग-अलग भारतीय भाषाओं का ज्ञान उनके लेखन को केवल भाषायी विविधता ही नहीं देता, बल्कि भारत की अलग-अलग साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्पराओं के बीच संवाद स्थापित करने की क्षमता भी प्रदान करता है।

यही बहुभाषिक दृष्टि उन्हें एक विशुद्ध विषय-विशेषज्ञ से आगे बढ़ाकर भारतीय साहित्य और संस्कृति के व्यापक अध्येता के रूप में स्थापित करती है।


🏫 अध्यापन यात्रा की शुरुआत — 1978

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ की औपचारिक शैक्षणिक यात्रा 1978 में प्रारंभ हुई।

1978–1982

प्रधानाध्यापक — भागीरथी संस्कृतोच्च विद्यालय, कनकपुर

अपने करियर के प्रारंभिक चरण में ही उन्हें शैक्षणिक नेतृत्व की जिम्मेदारी मिली।

यह अवधि उनके लिए शिक्षण, प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच संस्कृत अध्ययन को जीवंत बनाए रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही।


📚 लक्ष्मीवती संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापन

1982–1991

व्याख्याता — साहित्य विभाग

लक्ष्मीवती संस्कृत महाविद्यालय, सरिसब-पाही

यह काल उनके विश्वविद्यालयीय और उच्च शिक्षा आधारित अध्यापन का महत्वपूर्ण चरण बना।

साहित्य विभाग में व्याख्याता के रूप में उन्होंने संस्कृत साहित्य के गहन अध्ययन, अध्यापन और शोध को आगे बढ़ाया।

यहीं से उनकी पहचान एक गंभीर अध्येता और शिक्षक के रूप में और अधिक मजबूत हुई।


🇮🇳 राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में दीर्घ शैक्षणिक सेवा

1991–2009

रीडर — साहित्य विभाग

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार

1991 में उनका शैक्षणिक जीवन राष्ट्रीय स्तर की संस्था से जुड़ा।

उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में पहले शृंगेरी, कर्नाटक और बाद में इलाहाबाद में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।

इस दौरान उनका कार्य केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने शोध, साहित्यिक अध्ययन, पाण्डित्य परम्परा, विद्यार्थियों के मार्गदर्शन और भारतीय ज्ञान-विरासत से जुड़े विषयों पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया।


👨‍🏫 प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष

2009–2024

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष — साहित्य विभाग

लगभग डेढ़ दशक तक उन्होंने प्रोफेसर एवं साहित्य विभागाध्यक्ष के रूप में उच्च शैक्षणिक नेतृत्व प्रदान किया।

यह काल उनकी विद्वत् यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय रहा।

एक वरिष्ठ प्राध्यापक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों, शोधार्थियों और युवा अध्येताओं को संस्कृत साहित्य तथा भारतीय ज्ञान परम्परा के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।


🎓 डीन — साहित्य विद्या शाखा

2018–2024

डॉ. झा ने साहित्य विद्या शाखा के डीन के रूप में भी छह वर्षों तक महत्वपूर्ण शैक्षणिक नेतृत्व प्रदान किया।

इस भूमिका में वे केवल किसी एक विभाग तक सीमित नहीं रहे, बल्कि व्यापक अकादमिक नीति, साहित्यिक अध्ययन, शोध और शैक्षणिक प्रशासन से जुड़े।

2024 में वे सक्रिय विश्वविद्यालयीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए, किंतु उनका साहित्यिक और बौद्धिक योगदान उसके बाद भी उनकी कृतियों के माध्यम से निरंतर जीवित है।


📚 ★ 145 पुस्तकों की विशाल साहित्यिक विरासत

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ की सबसे बड़ी उपलब्धियों में उनका असाधारण ग्रन्थ-सृजन है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्होंने:

लगभग 145 पुस्तकें

लिखी हैं।

इनमें सम्मिलित हैं:

✦ मौलिक ग्रन्थ
✦ शोधपरक पुस्तकें
✦ अनुवाद
✦ टीका एवं व्याख्या ग्रन्थ
✦ साहित्यिक कृतियाँ
✦ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन
✦ दर्शन और शास्त्रीय परम्पराओं से संबंधित लेखन

उनकी रचनाएँ संस्कृत तक सीमित नहीं हैं। हिन्दी, मैथिली, ओड़िया और अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में उनका लेखन उपलब्ध होने का उल्लेख मिलता है।


📖 प्रमुख ग्रन्थ एवं विषय

उनकी उल्लेखनीय रचनाओं एवं अध्ययन-विषयों में निम्न नाम विशेष रूप से सामने आते हैं:

व्याकरण महाभाष्य की व्याख्या

आर्यसप्तशती की व्याख्या

भर्तृहरि निर्वेद की व्याख्या

ईशावास्योपनिषद की व्याख्या

वैदिक साहित्य और संस्कृति

मिथिला में वेद और वेदांग

मिथिला की दर्शन परम्परा

तन्त्र विद्या और मिथिला का योगदान

विज्ञान और मिथिला

विंश शताब्दी मैथिली कथा संचयन

इसके अतिरिक्त उनकी साहित्यिक कृतियों में:

घूँघट • अनोखी दुनिया • मैं एकान्त में हूँ • प्रीति की आशा

तथा अनेक अन्य रचनाओं का उल्लेख मिलता है।

उनका लेखन शास्त्रीय व्याख्या से लेकर आधुनिक साहित्य और क्षेत्रीय इतिहास तक फैला हुआ है।


🕉️ मिथिला की ज्ञान-परम्परा के दस्तावेजीकरण में योगदान

डॉ. झा के शोध और लेखन का एक महत्वपूर्ण पक्ष मिथिला की बौद्धिक विरासत का अध्ययन है।

उन्होंने विशेष रूप से:

🔹 वेद और वेदांग
🔹 दर्शन
🔹 व्याकरण
🔹 तन्त्र
🔹 साहित्य
🔹 विज्ञान
🔹 संस्कृति
🔹 विद्वत् परम्पराओं

के संदर्भ में मिथिला के योगदान को सामने लाने का प्रयास किया।

इस दृष्टि से उनकी कई रचनाएँ केवल साहित्यिक कृतियाँ नहीं बल्कि सांस्कृतिक अभिलेख और बौद्धिक इतिहास के दस्तावेज के रूप में भी देखी जा सकती हैं।


✍️ लेखन की व्यापकता

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ के लेखन में एक साथ कई स्वर दिखाई देते हैं।

वे:

शास्त्र के व्याख्याकार हैं

जो प्राचीन ग्रन्थों को समझाते हैं।

इतिहास और संस्कृति के शोधकर्ता हैं

जो अतीत के बौद्धिक योगदान को खोजते और दस्तावेजीकृत करते हैं।

साहित्यकार हैं

जो रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से समाज और व्यक्ति को देखते हैं।

भाषाविद् हैं

जिनकी रुचि विभिन्न भारतीय भाषाओं के स्वरूप और साहित्य में रही है।

अनुवादक हैं

जो अलग-अलग भाषायी परम्पराओं के बीच सेतु निर्मित करते हैं।

इस बहुआयामी स्वरूप ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को असाधारण विस्तार प्रदान किया।


🔍 शोध एवं रुचियाँ

उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल हैं:

🔎 अनुसन्धान
📜 इतिहास
🛕 संस्कृति
✍️ लेखन
🏛️ राजनीति

इन विविध रुचियों के कारण उनका चिंतन केवल किसी एक शास्त्रीय विषय तक सीमित नहीं रहा।

वे भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा और इतिहास को एक समग्र बौद्धिक दृष्टिकोण से देखने वाले अध्येता के रूप में सामने आते हैं।


🏆 सम्मान एवं पुरस्कार

अपने दीर्घ साहित्यिक और शैक्षणिक जीवन में डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित किए जाने का उल्लेख मिलता है।

इनमें प्रमुख हैं:

🥇 स्वर्ण पदक

🏆 हरिऔध सम्मान

🌟 सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार

📚 चेतना सम्मान

🏅 साहित्य अकादमी पुरस्कार

इन सम्मानों ने उनकी बहुभाषी साहित्य-साधना, शोध, रचनात्मकता और भारतीय साहित्यिक परम्पराओं में उनके योगदान को सार्वजनिक पहचान प्रदान की।


🌿 परम्परा और आधुनिकता के बीच सेतु

डॉ. झा की विद्वत्ता की एक बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने प्राचीन ज्ञान को केवल अतीत का विषय मानकर नहीं देखा।

व्याकरण, दर्शन, वेद-वेदांग, उपनिषद, तन्त्र और संस्कृत साहित्य का अध्ययन करते हुए उन्होंने इन विषयों को समकालीन शोध और आधुनिक भाषायी संदर्भ से जोड़ने का प्रयास किया।

इस दृष्टि से उनका कार्य:

परम्परा का संरक्षण

और

आधुनिक बौद्धिक पुनर्पाठ

दोनों को साथ लेकर चलता है।


🎓 चार दशकों से अधिक की शैक्षणिक साधना

1978 में प्रधानाध्यापक के रूप में आरंभ हुई उनकी औपचारिक शैक्षणिक यात्रा 2024 तक सक्रिय रूप से जारी रही।

अर्थात् लगभग:

46 वर्षों की शैक्षणिक एवं अध्यापन यात्रा

के दौरान उन्होंने विद्यालय, महाविद्यालय और राष्ट्रीय स्तर की उच्च शिक्षण संस्थाओं में कार्य किया।

इस अवधि में वे:

प्रधानाध्यापक → व्याख्याता → रीडर → प्रोफेसर → विभागाध्यक्ष → डीन

तक की जिम्मेदारियों से गुजरे।

यह क्रम उनके शैक्षणिक जीवन की निरंतर प्रगति और संस्थागत योगदान को दर्शाता है।


👨‍🎓 एक शिक्षक की विरासत

किसी विश्वविद्यालयी शिक्षक की उपलब्धि केवल उसके लिखे ग्रन्थों में नहीं, बल्कि उन विद्यार्थियों और शोधार्थियों में भी दिखाई देती है जिन्हें वह प्रभावित करता है।

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ ने अपने लंबे अध्यापन जीवन में संस्कृत साहित्य और भारतीय विद्या की अनेक पीढ़ियों के विद्यार्थियों के साथ कार्य किया।

उनका शिक्षक-व्यक्तित्व:

अनुशासन • शास्त्रीय अध्ययन • शोध • भाषा-प्रेम • लेखन

पर आधारित रहा।


🌟 भारतीय भाषाओं के बीच एक साहित्यिक सेतु

बहुभाषिकता डॉ. झा की बौद्धिक पहचान का केंद्रीय पक्ष है।

संस्कृत के गहरे शास्त्रीय अध्ययन के साथ हिन्दी, मैथिली, ओड़िया, अंग्रेजी, गुजराती और कन्नड़ जैसी भाषाओं से उनका जुड़ाव उन्हें भारतीय भाषायी विविधता का जीवंत प्रतिनिधि बनाता है।

उनका कार्य इस विचार को मजबूत करता है कि:

भारतीय साहित्य को किसी एक भाषा की सीमा में नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं और परम्पराओं के संयुक्त सांस्कृतिक संसार के रूप में समझा जाना चाहिए।


👑 एक विद्वान परिवार की आधुनिक विरासत

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ का जीवन उस ऐतिहासिक विद्वत् परम्परा की आधुनिक अभिव्यक्ति है जिसमें उनके पूर्वजों ने दर्शन, व्याकरण, साहित्य और संस्कृत अध्ययन के क्षेत्र में प्रतिष्ठा अर्जित की।

उनके परिवार में दस से अधिक महामहोपाध्यायों और ग्रन्थकारों के होने का उल्लेख मिलता है।

इसलिए उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को उनके विस्तृत पारिवारिक और सांस्कृतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने इस विरासत को केवल प्राप्त नहीं किया—अपने व्यापक लेखन, अध्यापन और शोध के माध्यम से इसे आगे भी बढ़ाया।


व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक प्रोफ़ाइल

पूरा नाम: ★ डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’
साहित्यिक/छद्म नाम: नागानन्द
जन्मतिथि: 06 अप्रैल 1959*
पैतृक ग्राम: बिट्ठो
पंचायत: सरिसब-पाही
प्रखंड: पण्डौल
जिला: मधुबनी, बिहार
राष्ट्रीयता: भारतीय 🇮🇳

शैक्षणिक योग्यताएँ

आचार्य: व्याकरण एवं साहित्य
M.A.: संस्कृत एवं भाषाविज्ञान
साहित्यरत्न: हिन्दी
डिप्लोमा: गुजराती एवं कन्नड़
कोविद: ओड़िया
Ph.D.: दो विषयों में, दो विश्वविद्यालयों से
D.Litt.: उच्च शोध उपाधि

प्रमुख पहचान

संस्कृतविद् • बहुभाषी लेखक • साहित्यकार • शोधकर्ता • भाषाविद् • शिक्षक • अनुवादक

रचित पुस्तकें

लगभग 145

अध्यापन एवं शैक्षणिक सेवा

1978–2024

सेवानिवृत्ति

2024

प्रमुख रुचियाँ

अनुसन्धान • इतिहास • संस्कृति • लेखन • राजनीति


🏛️ शैक्षणिक यात्रा — एक नज़र में

1978–1982
प्रधानाध्यापक
भागीरथी संस्कृतोच्च विद्यालय, कनकपुर

1982–1991
व्याख्याता, साहित्य विभाग
लक्ष्मीवती संस्कृत महाविद्यालय, सरिसब-पाही

1991–2009
रीडर, साहित्य विभाग
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
शृंगेरी एवं इलाहाबाद

2009–2024
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, साहित्य विभाग

2018–2024
डीन, साहित्य विद्या शाखा

2024
विश्वविद्यालयीय सेवा से सेवानिवृत्ति


एक जीवन — साहित्य और ज्ञान के नाम

डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ की जीवन-यात्रा भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति लगभग आजीवन समर्पण की कहानी है।

मिथिला की एक प्रतिष्ठित विद्वत् परम्परा में जन्म लेकर उन्होंने आधुनिक विश्वविद्यालयी संसार तक अपनी पहचान बनाई।

उन्होंने पढ़ा भी, पढ़ाया भी।

उन्होंने शोध किया भी, लिखा भी।

उन्होंने परम्परा को संरक्षित भी किया और अनेक भाषाओं के माध्यम से उसका विस्तार भी किया।

लगभग 145 पुस्तकों की विशाल साहित्यिक विरासत और 46 वर्षों के शैक्षणिक जीवन के साथ उनकी यात्रा उन्हें आधुनिक भारतीय संस्कृत एवं बहुभाषी साहित्य-जगत का एक उल्लेखनीय विद्वान बनाती है।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण विरासत शायद यही है कि उन्होंने ज्ञान को केवल अर्जित नहीं किया—उसे पुस्तक, अध्यापन, अनुवाद और शोध के माध्यम से अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास किया।


✦ ★ डॉ. उदयनाथ झा ‘अशोक’ ★ ✦

‘नागानन्द’

संस्कृतविद् • बहुभाषी साहित्यकार • भाषाविद् • शोधकर्ता • शिक्षाविद्

“ज्ञान की वास्तविक परम्परा वही है जो अध्ययन से आरम्भ होकर सृजन, अध्यापन और अगली पीढ़ी तक उसके हस्तांतरण में पूर्ण होती है।”

📚 145 पुस्तकें • 46 वर्षों की शैक्षणिक साधना • अनेक भाषाएँ • एक विराट साहित्यिक यात्रा

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